बारिश..

आज बारिश हुई।  दिल्ली के वातावरण में वक़्त गुज़ारते हुए प्रकृति से ऐसी मुलाक़ात मन को छू लेने वाली थी। हवाओं संग उड़ती नन्ही बूंदों से टकरा कर एक अलग ही आनंद की अनुभूति हुई।  ये अहसास अपने आप में एक जड़ी बूटी के जैसा काम करता है शायद। कई दिनों, महीनों की इक्कठी थकान साथ में दूर कर देता है ये।  रोज़ की ज़िन्दगी, जिसका की लगभग तीन चौथाई हिस्सा 10 X 15 फुट के कमरे में किताबों के साथ ही निकल जाता है। कभी कभी मन बहलाना होता है तो यूँही कुछ गाने सुन लिया करते हैं या पास के मैदान में टहल लेते हैं थोड़ी देर।  आज जब यूँही उलझन भरी शाम में अचानक से बारिश की बूंदों की आवाज़ आयी तो ध्यान खींच गया । जब अपने कमरे का गेट खोलता हूँ तो एक अद्भुत नज़ारे से रूबरू  होता हूँ।  क्या देखता हूँ की इस सुनहरी शाम में कोई अपने घर के बाहर नहीं है, रोज़ की भीड़ आज छुप रखी है कहीं। मुझ जैसे ही कुछ स्टूडेंट हैं, जो बंद कमरे से त्रस्त मानो सच मायने में आज सांस लेने निकले हों। बच्चों का एक छोटा समूह है जो की थोड़ी दूर पे एक एस्बेस्टस की शेड के नीचे अपने अलग ही खेल में लगा है - गीली मिटटी में पैर गंदे करने में कोई संकोच नहीं कर रहा आज। ये सब देखते हुए अपने होठों पे एक छोटी मुस्कान कब आ गयी, पता नहीं चला। मैं भी यूँही अपनी बचपन की यादों की तरफ बढ़ ही रहा होता हूँ कि एक हवा का झोंका आता है और उसमें कैद बूँदें मेरे चेहरे से टकरा कर आज़ाद हो जाती हैं जैसे। मेरी आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं और मुस्कान पूरे चेहरे पे फ़ैल जाती है। ये एक गज़ब का सुखद एहसास है।

करीब दस मिनट तक प्रकृति के बाकी प्यासे अंगों और इस बारिश का मिलन होता हुआ देखता हूँ, बीच-बीच में अपना हाथ आगे कर देता हूँ और कुछ हद तक इस बारिश को समेटने की कोशिश करता हूँ। ये पक्के मकानों और सड़कों में दबी मिटटी की खोयी खुशबू कई दिनों बाद आयी। थोड़ी जो किनारे पे कच्ची सड़क है उसपर बहती धार ने रास्ता बना लिया है। एक बात और पेड़ अब ज्यादा हरे लग रहे हैं|(:

अब ये बारिश रुक गयी, बादल भी थोड़ा शांत हो गया, बच्चे मैदान में वापस आ गए और मैं तैयार कर रहा हूँ खुद को वापस कमरे में जाने के लिए, पर इस एहसास को एहसास भर नहीं रहने  देना चाहता मैं। जानता हूँ की आगे भी बारिश होगी, फिर ऐसे दिल छूने वाले पल आएंगे, लेकिन आज के एहसास को शब्दों में ढाल लूंगा।
चलता हूँ (:

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